दिवाली ग़ज़ल

आँखों के दीये रौशन ,दिल नूर के प्याले हैं .
क्या खूब दिवाली है ,क्या ख़ूब उजाले हैं .
इस बार के मिलने पर एहसास ये जागा है .
पहचान पुरानी है ,अंदाज़ निराले हैं .
ये सुलह-सफ़ाई का मौसम भी निराला है .
इनकार की लौ मद्दहम ,इक़रार के हाले है .
घर-बार से थी दूरी ,अब लौट के घर आए .
उल्फ़त के परिंदे अब शब के हवाले हैं .
मायूसी के ये बादल क्या ख़ूब छटे `तिश्ना `.
नैनों ने जतन कर के सब ख़्वाब संभाले हैं .
………….मसूद बेग `तिश्ना `,इन्दौर ,इंडिया



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